चित्तौड़गढ़। जिले की कांग्रेस राजनीति में पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह जाड़ावत और जिला कांग्रेस अध्यक्ष प्रमोद सिसोदिया के बीच कथित राजनीतिक खींचतान एक बार फिर चर्चा में है। जिला कांग्रेस में सिसोदिया को पूर्व मंत्री उदयलाल आंजना के करीब माना जाता है, जबकि जाड़ावत और आंजना के बीच राजनीतिक मतभेद लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों में जिला अध्यक्ष पद को लेकर भी दोनों खेमों के बीच दूरी का उल्लेख हुआ है।
हालिया नगर निकाय चुनाव परिणाम ने इन सवालों को और हवा दी है। चित्तौड़गढ़ नगर परिषद में भाजपा को 33 और कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं, जबकि निंबाहेड़ा में भाजपा 27 और कांग्रेस 17 वार्डों पर रही। निंबाहेड़ा में भाजपा की शिल्पा भूतड़ा निर्विरोध सभापति चुनी गईं।
पूर्व जिलाध्यक्ष का पत्र बना नया मुद्दा
इसी बीच कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष भैरूलाल चौधरी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को पत्र लिखकर प्रमोद सिसोदिया की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और उन्हें पद से हटाने तथा पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। पत्र में कपासन और चित्तौड़गढ़ के निकाय चुनावों में संगठनात्मक निर्णयों तथा कथित क्रॉस-वोटिंग को लेकर आरोप लगाए गए हैं। ये चौधरी द्वारा लगाए गए आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं हुई
आंजना–जाड़ावत समीकरण के बीच सिसोदिया की भूमिका पर चर्चा
कांग्रेस की स्थानीय राजनीति में सिसोदिया को उदयलाल आंजना के खेमे से जोड़कर देखा जाता है। वहीं जाड़ावत खेमे की अलग राजनीतिक पकड़ मानी जाती रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या दो प्रभावशाली खेमों के बीच की दूरी का असर संगठन और चुनावी प्रबंधन पर पड़ रहा है? निंबाहेड़ा में चुनाव के दौरान कांग्रेस की कमान खुद उदयलाल आंजना संभाल रहे थे, जबकि भाजपा की ओर से विधायक श्रीचंद कृपलानी सक्रिय थे।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया और स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में सिसोदिया और भाजपा विधायक श्रीचंद कृपलानी के बीच कथित मित्रता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती, इसलिए इसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल—पंचायत चुनाव में क्या होगा?
नगर निकाय चुनाव के बाद अब कांग्रेस के सामने पंचायती राज चुनाव की चुनौती है। संगठन के भीतर यदि गुटीय मतभेद जारी रहे तो टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व के सामने यह भी चुनौती है कि जाड़ावत, आंजना और सिसोदिया से जुड़े राजनीतिक समीकरणों के बीच संगठन को किस तरह एक मंच पर रखा जाए।
चित्तौड़गढ़ कांग्रेस के सामने अब असली परीक्षा यही है—क्या व्यक्तिगत और गुटीय समीकरण पीछे छूटेंगे, या संगठन की राजनीति में खींचतान आगे भी चुनावी मुद्दा बनी रहेगी?
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