जयपुर। (Pawan pujari)राजस्थान में नगर निकाय चुनाव का सबसे अहम चरण अब शुरू हो गया है। 3 सितंबर को नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आज 4 सितंबर को चुनाव मैदान में बचे प्रत्याशियों को निर्वाचन आयोग चुनाव चिह्न आवंटित करेगा। इसके साथ ही चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी और प्रचार अभियान में तेजी आने की उम्मीद है।
राज्य के 309 नगरीय निकायों की 10,245 पार्षद सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। मतदान 9 और 11 सितंबर को दो चरणों में होगा तथा मतगणना 14 सितंबर को होगी।
डोटासरा बनाम मदन राठौड़—किसकी रणनीति भारी?
इन चुनावों को केवल स्थानीय निकायों की लड़ाई के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चुनाव भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के लिए भी प्रतिष्ठा की परीक्षा माना जा रहा है। कांग्रेस की प्रदेश कमान गोविंद सिंह डोटासरा के पास है।
दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की है। टिकट वितरण के बाद कई जगह बागी प्रत्याशियों के मैदान में उतरने से भाजपा और कांग्रेस दोनों को अपने-अपने असंतुष्ट दावेदारों को मनाने की चुनौती का सामना करना पड़ा।
अब चुनाव चिह्न मिलने के बाद तस्वीर और दिलचस्प होगी—कौन पार्टी अपने वोट को एकजुट रख पाती है और किसके बागी अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, इसका सीधा असर वार्ड स्तर के परिणामों पर पड़ सकता है।
भजनलाल सरकार की भी होगी अग्निपरीक्षा
नगर निकाय चुनावों का दूसरा बड़ा राजनीतिक पहलू मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए जनता के मूड का आकलन है। भजनलाल शर्मा ने दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।
इस लिहाज से निकाय चुनाव सरकार के कार्यकाल के बीच होने वाला एक महत्वपूर्ण जमीनी परीक्षण बन गए हैं। स्थानीय मुद्दे—सड़क, सफाई, पेयजल, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण और शहरों का विकास—सीधे मतदाता के सामने हैं। ऐसे में भाजपा इन चुनावों में सरकार के कामकाज और संगठन की पकड़ को जनता के बीच परखना चाहेगी।
वहीं कांग्रेस के लिए यह मौका सरकार के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को वोट में बदलने का है। कांग्रेस यदि बड़ी संख्या में निकायों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो इसे विपक्ष के लिए राजनीतिक संजीवनी के तौर पर देखा जा सकता है।
विधायकों की भी प्रतिष्ठा जुड़ी
इन चुनावों का असर केवल जयपुर या बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश के अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के विधायक, मंत्री और स्थानीय संगठन के नेताओं की पकड़ भी कसौटी पर होगी।
खास तौर पर वे विधायक जिन्होंने 2023 में भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में जगह बनाई है, उनके क्षेत्रों में निकाय चुनाव का प्रदर्शन उनके राजनीतिक प्रभाव का संकेत माना जा सकता है। वहीं जिन क्षेत्रों में भाजपा प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर पाए थे, वहां निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन पार्टी के लिए वापसी का संकेत हो सकता है।
2028 के टिकटों तक पहुंचेगा असर?
राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या 2026 के निकाय चुनावों का असर 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण तक दिखाई देगा?
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि निकाय चुनाव का कोई एक परिणाम सीधे 2028 के टिकट का आधार बनेगा, लेकिन पार्टी संगठन आमतौर पर स्थानीय चुनावों में नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता, संगठन क्षमता और चुनाव जिताने की क्षमता को जरूर देखता है। इसलिए मौजूदा चुनाव कई स्थानीय नेताओं के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव को साबित करने का अवसर भी हैं।
इसके बाद पंचायत चुनाव की बारी
नगर निकाय चुनाव के तुरंत बाद राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी। ऐसे में अगले कुछ सप्ताह राजस्थान की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
यानी नगर निकाय चुनाव को केवल पार्षद, सभापति या महापौर की कुर्सी की लड़ाई मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह चुनाव प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों के संगठन, नेतृत्व और जमीनी पकड़ का भी बड़ा इम्तिहान है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस शहर में कौन जीतेगा—सवाल यह भी है कि राजस्थान की जनता किस राजनीतिक रणनीति पर भरोसा जताती है।
डोटासरा की कांग्रेस बागियों और संगठन को कितना साध पाती है?
मदन राठौड़ भाजपा के संगठन और सरकार की उपलब्धियों को वोट में कितना बदल पाते हैं?
और क्या भजनलाल सरकार जनता का भरोसा स्थानीय चुनावों में कायम रख पाएगी?
इन सवालों के जवाब 14 सितंबर को आने वाले नतीजों के साथ काफी हद तक सामने आ जाएंगे।
