राजसमंद। राजस्थान में शहरी निकाय चुनावों की रणभेरी बजते ही राजसमंद जिले में भी चार शहरों की सरकार चुनने का बड़ा चुनावी युद्ध शुरू हो गया है। जिले की राजसमंद नगर परिषद, नाथद्वारा, देवगढ़ और आमेट नगर पालिकाओं में भाजपा और कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है। लेकिन दोनों ही दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने ही बागी और असंतुष्ट नेताओं-कार्यकर्ताओं को मनाने की है।
आज शाम 3 बजे के बाद तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी कि भाजपा और कांग्रेस अपने कितने बागियों को वापस पार्टी के साथ लाने में सफल होती हैं। यही बागी कई वार्डों में अधिकृत प्रत्याशियों का चुनावी गणित बिगाड़ सकते हैं।
इस चुनाव में भाजपा के जिलाध्यक्ष युधिष्ठिर पालीवाल और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष आदित्य प्रताप सिंह दोनों के लिए यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। भाजपा की बात करें तो जिले की चारों विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक हैं और प्रत्याशी चयन में स्थानीय विधायकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में यदि भाजपा चारों निकायों में मजबूत प्रदर्शन करती है तो संगठन की पकड़ और नेतृत्व की रणनीति मजबूत मानी जाएगी। वहीं कमजोर प्रदर्शन की स्थिति में सवाल संगठन और स्थानीय नेतृत्व की रणनीति पर जरूर उठेंगे।
दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए यह चुनाव और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजसमंद नगर परिषद और नाथद्वारा में पिछली बार कांग्रेस का बोर्ड रहा था, जबकि देवगढ़ और आमेट में भी कांग्रेस का प्रदर्शन प्रभावी रहा था। ऐसे में कांग्रेस जिलाध्यक्ष आदित्य प्रताप सिंह के सामने पुराने प्रदर्शन को दोहराने और संगठन को मजबूत साबित करने की बड़ी चुनौती है।
आदित्य प्रताप सिंह को लंबे मंथन के बाद कांग्रेस संगठन की कमान सौंपी गई है और वे सीपी जोशी खेमे से जुड़े नेता के रूप में देखे जाते हैं। ऐसे में यह चुनाव उनके लिए केवल निकाय चुनाव नहीं, बल्कि जिले की राजनीति में अपनी संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व क्षमता साबित करने का अवसर भी है।
वहीं भाजपा के सामने स्वर्ण समाज में चल रही नाराजगी और स्थानीय मुद्दों को साधने की चुनौती है। दोनों ही दलों के लिए यह देखना अहम होगा कि वे नाराज कार्यकर्ताओं और बागियों को किस हद तक वापस अपने पक्ष में ला पाते हैं।
अब असली सवाल यह है कि चार में से कितने निकायों में भाजपा अपना बोर्ड बना पाएगी और कांग्रेस कितने पुराने किले बचा पाएगी? और उससे भी बड़ा सवाल—आज दोपहर 3 बजे तक कितने बागी वापस पार्टी के साथ खड़े होते हैं?
क्योंकि राजसमंद में इस बार मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस का नहीं है। यह मुकाबला संगठन बनाम बगावत, नेतृत्व बनाम असंतोष और स्थानीय सियासी पकड़ बनाम व्यक्तिगत प्रभाव का भी है।
3 बजे के बाद सामने आने वाली तस्वीर बताएगी कि दोनों दलों के जिलाध्यक्ष अपनी पहली बड़ी चुनावी परीक्षा में कितने सफल रहे।
राजसमंद में ‘चार शहरों की सरकार’ का महासंग्राम
